शनिवार, 2 जून 2012

सच का सामना

दोस्तों, देश के सबसे मशहूर शो “सच का सामना” में आज आपकी मुलाकात एक ऐसे व्यक्ति से करायेंगे जो पैसों के लिए नहीं केवल शोहरत बटोरने आईं है । पेशे से जल बचाओ आंदोलन के अंतराष्ट्रीय ख्यातिलब्ध मोमबत्ती ब्रिग्रेडी अग्निप्रज्वलकर्ता आदरणीया “ मेरिण्डा फटीचादर” आज सच का सामना के तीखे प्रश्नो का जवाब देंगी और इनकी इज्जत बच गई तो इसकी फुटेज अमेरिका भेजकर चंदा बटोरेंगी । अगर आपका दिल करता है तो स्वागत करें बाबा मेरिण्डा ताई जी का ..  नहीं  करता तो ना करें । ताई ने पहले से ही स्वागत के लिए अपने चमचों को बुला रखा है । 

तो मेरिण्डा ताई जी आपने अपना पूरा जीवन जल बचाओ आंदोलन में लगा दिया है । आपके सुनहरे बाल बिखरे हुए जरूर हैं लेकिन शरीर बिल्कुल स्वच्छ है और भीनी भीनी खूशबू भी आ रही है ।

महाराज का पहला सवाल आपसे है => क्या आपने कभी नग्न अवस्था में स्नान किया है ?

मेरिण्डा =>  नहीं 

आईये देखते हैं पालीग्रफिक मशीन क्या कहती है .. 

कम्प्यूटर =>   ये जवाब ...........................  बिल्कुल सही है

आप ये कैसे कर लेतीं हैं ... मतलब पूरे कपड़े पहन कर कैसे नहा लेतीं हैं ??

मेरिण्डा ताई =>  चिंतन से ! किताबों से नहाने की विधि पढ़कर मन में ये भाव उत्पन्न कर लेतीं हूँ कि अथाह जल में डुबकी लगा रही हूँ ।  इस तरह से स्नान की अनुभुति हो जाती है और जल का दुरूपयोग भी नहीं होता । मैं जल के दुरूपयोग की सख्त मुखालफत करती हूँ ।

महाराज => मतलब क्या आप शौच हेतु भी जल का प्रयोग नहीं करती ?

मेरिण्डा ताई => नहीं मैंने आपको कहा ना जल का  किसी भी रूप में अपव्यय समाज और पर्यावरण के लिए हानिकारक है । हमारे आंदोलन से जुड़े कुछ विदेशी भाई बहन भी हैं जो हमें इस कार्य हेतु  विशेष प्रकार के कागज भेजते हैं ।

महाराज => फिर तो आप गर्मी में कूलर का भी उपयोग नहीं करती होंगी ?

मिरिण्डा ताई => बिल्कुल नहीं ऐसा कोई भी कार्य जो जिसमें जल का उपयोग होता है उसका हम विरोध करतें  हैं । नैसर्गिक जल पर समाज के निचले तबके का अधिकार होना चाहिए अत: इसका उपयोग किसी भी स्थिति में उच्च वर्ग के लोगों के लिए प्रतिबंधित होना चाहिए । इसिलिए हम पीने का पानी भी बोतल वाला पीते हैं , हैण्डपंप या कुँये का नहीं ।

महाराज =>  तो आप अपने पसीने और मैल की बदबू से कैसे निजात पाते हैं ?  

मिरिण्डा ताई => हम हमेशा वातानूकूलित कक्ष में रहते हैं सो पसीने का सवाल ही नहीं ।  हाँ गरीबों पर चिंतन करते करते कभी कभी आन्दोलन आदि के लिए झोपड़पट्टी की तरफ फोटो खिचाने जाते हैं तो वापसी पर स्टीमबाथ लेकर परफ्यूम स्प्रे करते हैं लेकिन जल का उपयोग नहीं करते क्योंकि जल संरक्षण हमारे जीवन का मुख्य लक्ष्य है ।

महाराज =>  आप कपड़े धोने के लिए तो पानी का इस्तेमाल करती ही होंगी ?

मिरिण्डा ताई => नहीं इसका तो सवाल ही नहीं उठता, हमारे सारे कपड़े ड्राईक्लीन होते हैं।

इससे पहले की महाराज मिरिण्डा ताई से और सच उगलवाते उनके बोतल में मिलाये गये अफीम का नशा उतर गया और तमरमाती हुई बोलीं सुनो महाराज अगर धोखे से भी इस एपिसोड का प्रसारण हुआ तो सारे बाँध बचाओ आंदोलन की दिशा तुम्हारी तरफ मोड़ दूँगी । तुम्हारे इस एक एपिसोड से मेरे जीवनभर की  मेहनत खराब हो जायेगी । हाँ अगर कुछ चंदा पानी या एवार्ड की  चाहत है तो बताओ उसका जुगाड़  करवा दूँगी लेकिन ये एपिसोड किसी भी स्थिति में टेलिकॉस्ट नहीं होना चाहिए ।

हमने कहा सुनो ताई ये धमकी और लालच किसी और को देना । नंगा नहायेगा क्या और निचोड़ेगा क्या ? हमारे पास है ही क्या जो तुम बिगाड़ लोगी ? रही बात तुम्हारे चरित्र की तो अब धीरे धीरे सारी दुनिया में तुम्हारे जैसे जयचंदों की तस्वीर साफ होते जा रही है लेकिन अफसोस तो ये है कि तुम्हारी प्रजाति भी बेशरम के पौधे की तरह है एक के जड़ जमने की देर है पूरी बस्ती ही बसा लेते हो ।

सोमवार, 28 मई 2012

फुरसतनामा: तेल का खेल मतलब केएलपीडी

फुरसतनामा: तेल का खेल मतलब केएलपीडी: इन दिनों नौतपा ने तपा कर रखा हुआ है और तेल ने अलग से आग सुलगाई हुई है। ऐसे में किसी असरदार व्यक्ति से राहत की उम्मीद करना और वो भी...

तेल का खेल मतलब केएलपीडी

इन दिनों नौतपा ने तपा कर रखा हुआ है और तेल ने अलग से आग सुलगाई हुई है। ऐसे में किसी असरदार व्यक्ति से राहत की उम्मीद करना और वो भी दोपहर के बारह बजे ठीक वैसा ही है जैसे शाहरूख की बात मानकर मर्दों वाली क्रीम लगाकर गोरा होना ।  सारे शरीर से जल की निकासी हो रही है और जहाँ से नहीं हो रही वहाँ से तेल निकल रहा है । ए.सी.के कम्प्रेसर ने भी दम तोड़ दिया तो नये कम्प्रेसर की स्थापना की गई लेकिन उसने भी बेवफा की तरह अपनी ताम्र नसों से तेल लिकेज कर आत्महत्या कर ली |
ऐसा मैं अपने पुराने ए.सी.इंजीनियर के उस बयान के आधार पर कह रहा हूँ जिसने कम्प्रेसर चेक करने के बाद बताया की ये खराब हो गया है । मैने पूछा ये तुम्हे कैसे मालूम हुआ तो उसने कहा देखिए इसका तेल निकल गया है । अब पुन: शिकायत दर्ज की है कम्पनी का मेसेज आया है कि कोई विरेंद्र नामक इंजीनियर टाईप चिकित्सक आयेगा और कम्प्रेससर ट्रांसप्लांट कर मुझे और ए.सी. दोनो को नवजीवन प्रदान करेगा। कुल मिलाकर ए.सी. ने मेरी ऐसी की तैसी कर रखा है ।
खैर ये तो हुई अंदर की बात और इसलिए लिखी कि भाई साहब अब हमें भी पता चल गया है कि बिना ए.सी. की सुविधा के कोई भी बुध्दजीवी “तोड़ती पत्थर” टाईप की रचना लिख नहीं पाता है । है कोई माई का लाल जो नाले का पानी पीकर “मधुशाला” लिखकर दिखाये ।
अरे तेल से याद आया कल एक परजीवी जिसे आम बोलचाल में बुध्दजीवी कहा जाता है मुझे तेल का गणित समझाने का प्रयास कर रहे थे । ठीक वैसे ही जैसे हरिया दूधवाला अपनी भैंस को दुहने के पहले पुचकारता है । कहा देखो महाराज तेल का 80 प्रतिशत हम आयात करते हैं तो इसकी कीमत अंतराष्ट्रीय बाजार पर निर्भर करती है । हमने कहा ठीक है भाई ये बात तो पहले कई बार पिंचुदादा भी बता चुके हैं इसमें नया क्या है । सवाल हमारा ये है कि क्या अभी अंतराष्ट्रीय बाजार में तेल का दाम बढ़ा है क्या ?  उन्होने कहा नहीं तो हमने दूसरा बाल फेंका तो फिर तेल का भाव क्यों बढ़ाया ?
उनके चेहरे के भाव देखकर हम समझ गये कि ये हमसे आज शास्त्रार्थ करेगा नहीं और इसे बिना कुछ खिलाये पिलाये हमारी बातों का जवाब देगा नहीं । तेल की कीमतों से जो हमारा तेल निकल रहा है उसका गुस्सा किसी पर तो निकालना ही था सो हमने ये सोचकर उसे जलपान का आमंत्रण दिया कि चलो साईकिल चला कर दो लीटर पेट्रोल कम डलवा लेंगे लेकिन अपनी भड़ास निकालेंगे जरूर ।    
आगे से हम सभी परजीवी बुध्दजीवीयों को “मामू” कहकर सम्बोधित करेंगे आपको ये सनद रहे कन्फ्यूजियाईगा नहीं ।
मामू ने कचौड़ी को कलमाड़ी की तरह कामनवेल्थ समझकर अपने गोदाम में पहुँचाया और कनिमोझी की तरह मुस्कुराकर कहा देखो महाराज तेल हम डॉलर में खरीदते हैं और रूपिया का भाव गिर गया है सो डॉलर मँहगा हो गया इसलिए हमको तेल रूपिया में मँहगा पड़ रहा है ।  हम कहा चलो ठीक है लेकिन केरोसीन, एलपीजी और डीजल के लिए रूपिया नहीं गिरा क्या या ये सब हम अपनी बाड़ी में ही पैदा करते हैं ?  
मामू ने सिर पकड़ा और कहा अरे यार महाराज आप तो निपट गँवार हो । अरे इस केएलडी (KLD) पर सरकार कम्पनियों को सबसीडी दे रही है इसलिए इनका नियंत्रण सरकार के पास है । हम कहा चलो ये भी मान लिया लेकिन ये केएलडी क्या है और इस पर सरकार क्यूँ सबसीडी दे रही है । मामू ने लगभग झल्लाते हुए कहा महाराज अपने खिलाये नमक का ज्यादे इम्तिहान मत लो । अरे यार केएलडी (KLD) मतलब केरोसीन, एलपीजी और डीजल और इसमें सबसीडी इसलिए दे रही है क्योंकि इसका उपयोग गरीब और किसान करते हैं ।
लेकिन हम भी ठहरे पक्के मारवाड़ी अपने कचौड़ी का पैसा वसूल किये बिना छोड़ने वाले नहीं थे भले ही दस रूपिया और इंवेस्ट हो जाय पर उँगली पूरी करेंगे । इसलिए चाय का आर्डर देते हुए पूछा अरे यार मामू ये बताओ जब इस देश का साठ परसेंट आदमी 32 रूपिया रोज कमाता है तो वो सिलेंडर और डीजल क्या खाक खरीदता होगा और रही बात किरोसिन की वो तो आजकल बहुओं को जलाने के ही काम आती है और ये हमें बेवकूफ मत बनाओं गरीब आदमी या तो गोबर के कण्डों से खाना बनाता है या फिर भूखे ही सो जाता है किरोसीन और डीजल बड़े बड़े उद्योगपतियों के कारखानों में या फिर पुरानी ट्रकों और बसों के टैंक में नजर आती है । और रही बात एलपीजी की तो आधी गैस तो मँहगी पेट्रोल कारों के डिक्की में इंधन सप्लाई करती नजर आती है ।
अब हमें मामू का चेहरा कैबिनेट की तरह नजर आ रहा था सो हमने मामू के उपर भड़ास तो खूब निकाली लेकिन एक फेसबुकिये दोस्त ने कहा वो सब मत लिखो क्योंकि ज्यादे लम्बे लिखोगे तो कोई पढ़ेगा नहीं और फिर बात निकलेगी तो फिर लेख में शब्द सर्वसाधारण के प्रयुक्त होने लगेंगे और कुछ मामू इसे अश्लील भाषा कह “A” सर्टिफिकेट घोषित करवाने के लिए घण्टा बजायेंगे इसलिए मामू को जो आपने आखिरी पंच मारा था वही लिख दे, समझने वाले समझ जायेंगे । हमने कहा ये भी ठीक है तो आखिरी पंच आप भी सुने और हमें विदा दें ।
हमने मामू से कहा अरे सुनो मामू इस सरकार से कहो कि ये केएलडी (KLD) पर सबसीडी का दिखावा बंद करे । या तो टैक्स कम कर पेट्रोल के दाम घटाये या फिर सबका दाम बढ़ाकर इस KLD में पेट्रोल का P भी घुसा ले ताकि ये पूरा केएलपीडी (KLPD) हो जाये जिससे आम जनता के प्रति उसका चरित्र भी सार्थक हो जायेगा ।

रविवार, 20 मई 2012

औसत का गणित


एक प्रसिध्द गणितज्ञ हुए । गणित की कई किताबें पढ़ी,शोध किया । फिर उन्होने औसत का सिध्दांत प्रतिपादित किया और प्रख्यात हुए । एक दिन अपनी पत्नी और तीन बच्चों के साथ वे किसी दूसरे गाँव की ओर जा रहे थे । रास्ते में नदी पड़ी । उन्होने अपने परिवार और किताबों को किनारे रख पानी की गहराई मापने नदी में उतर पड़े । कई स्थानों की गहराई मापी और किनारे पर वापस आ गये । दूसरे चक्र में स्वयं की, अपने पत्नी एवं बच्चों की उँचाई नापी एवं आँकड़ों से औसत उँचाई ज्ञात की । फिर नदी में पानी की गहराई के मापों का माध्य ज्ञात कर औसत गहराई निकाल दोनो औसतों की तुलना की और पाया कि उँचाई का औसत पानी की गहराई के औसत से काफी अधिक है ।

उन्होने अपनी पत्नी से कहा हमारी औसतन उँचाई नदी की औसतन गहराई से काफी ज्यादा है अत: नदी पार करने में डूबने का कोई खतरा नहीं है और वे नदी में उतर गये । नदी प्राकृतिक रूप से किनारों पर उथली थी और मध्य की ओर गहरी होती जा रही थी । मध्य में पहुँचते पहुँचते  अचानक पीछे से पत्नी ने आवाज लगाई छोटा लड़का डूब रहा है । गणितज्ञ पलटा । एक पल उसे लगा जैसे सारा जीवन व्यर्थ हो गया है, इसलिए नहीं कि बच्चा डूब रहा है बल्कि इसलिए कि उसके जीवन भर के शोध पर प्रश्न चिन्ह लग गया था । आघात बड़ा जबरदस्त था, लेकिन उसे विश्वास ही नहीं हो रहा था अतएव बदहवासी में बच्चे को बचाना छोड़ किनारे की ओर दौड़ा और अपने गणना की जाँच करता हुआ बड़बड़ाने लगा ये हो ही नहीं सकता की मेरा शोध गलत हो । मुझसे गणना में कहाँ चूक हो गई ।  

लेकिन सत्य तो यही था कि न तो शोध गलत था ना ही गणना गलत थी । यदि कुछ गलत था तो केवल उसका अनुप्रयोग । जीवन के गणित और किताबी गणित में कोई मेल नहीं है । जीवन में हमेशा दो और दो का जोड़ चार नहीं होता । किताबें, शोध, मनीषियों की बातें, जिंदगी जीने में सहायता कर सकती हैं लेकिन केवल उन्ही के सहारे अगर जिंदगी जीयेंगे तो हालात वही होंगे जो उस बच्चे का मँझधार में हुआ । जिंदगी को किताबों से हटाकर देखा जाना चाहिए । बुध्दिजीविता मानसिक संतुष्टि दे सकती है, अहम को तृप्त कर सकती है लेकिन खाने को दाने, तन ढकने को कपड़े और सर पर छत नहीं दे सकती । अगर ऐसा होता तो दुनिया में जितनी किताबें है उससे हर गरीब के लिए चार जोड़ी कपड़े सिल गये होते, हर घर में अनाज का भण्डार होता और तो और केवल अखबारों से ही कई मकान बना लिये गये होते ।

बस्तर में फैला नक्सलवाद भी इसी जद में आता है । तथाकथित मानवाधिकारी और समाजसेवी इसे उचित ठहराने के लिए कभी शोषण के खिलाफ विद्रोह, कभी अधिकारों के लिए युध्द कह महिमा मण्डित करने का प्रयास करते रहें है । वास्तव में इसका उन गरीब आदिवासियों से कोई सरोकार नहीं है । सरोकार है तो केवल अपनी दुकानदारी चलाने का ।

यद्यपि इस प्रभावित क्षेत्र में कई मोर्चों पर प्रशासनिक विफलता है और बुनियादी सुविधाओं का अभाव है तथा इसके कारण ही नक्सलवाद पोषित हो रहा है, लेकिन ये कहना कि इस क्षेत्र के समग्र विकास के लिए, शोषितों के मूलभूत अधिकारों के लिए और शोषण और दमन के विरूध्द नक्सलवाद है, कम से कम उन लोगों के लिए बेवकूफी है जो जमीनी हकीकत से वाकिफ हैं । अगर सचमुच में ये शोषितों और आदिवासियों के हक के लिए लड़ रहें है तो फिर ये अपने ही मजलूम और निर्दोष आदिवासी की हत्या नहीं करते । ये सड़कों, स्कूल भवनों और अस्पतालों को क्षति नहीं पहुँचाते और सबसे बड़ी बात ये कि कम से कम बीमार स्कूली बच्चों को ले जा रही एम्बूलेंस पर तो गोली नहीं दागते ।

क्या ये अच्छा नहीं होता कि वे सभी सरकारी अधिकारी और कर्मचारियों को पूरे क्षेत्र में निर्बाध आने जाने देते और जो अपने कर्तव्यों का ठीक ढंग से निर्वहन ना कर रहा हो उसके खिलाफ कार्यवाही करते या आवाज उठाते । आज तक ऐसे कितने मौके आये हैं जब नक्सलियों ने भ्रष्ट और कामचोर अधिकारियों को प्रताड़ित किया है या उनकी जनअदालत में सुनवाई की है । कहीं ऐसा तो नहीं कि लाभ के हिस्से में उनका भी प्रतिशत तय हो ।

बुधवार, 25 अप्रैल 2012

त्वरित टिप्पणी - बड़ा लेखक

इक्कीसवीं सदी में महान एवं प्रतिष्ठित लेखक केवल दो ही प्रकार के होते हैं – 

1 जो अपनी किताब मे क्या लिखा गया है इससे ज्यादा उसकी बिक्री कैसे बढ़ाई जाय इस योजना पर सफल हो जाय ।

2 जो खुद इतना सक्षम हो कि बाजार से अपनी किताबों की बिक्री बढ़वा दे ।  

क्योंकि किताबों की सफलता उसके विषयवस्तु , मौलिकता , लेखनशैली , और सही तथ्यात्मक जानकारी से नहीं बल्कि उसकी बिक्री एवं बाजार में माँग से तय होती है ।  

ये अलग शोध का विषय है कि किताबों की कितनी प्रति बिकी और कितनों ने उसे पढ़ा ।  

मैंने कोई किताब पढ़ी तो नहीं पर ये अनुभव जरूर किया है कि  अधिकांशत: लोग जो किताबें खरीदते हैं या खरीदने की हैसियत रखते हैं उनके पास इन्हे पढ़ने का समय नहीं और जिनके पास समय है उनके पास किताब खरीदने की हैसियत नहीं ।  

वर्तमान सामाजिक मापदण्डों के अनुसार सफल और समृध्द लोगों के पास ही किताबों का अनुपम संग्रह देखने को मिलता है और उनकी किताबों के संग्रह को देखकर आप अनुमान लगा सकते हैं कि यदि उन्होने उन सभी किताबों को पढ़ लिया है तो उन्हे किसी अन्य कार्य हेतु समय नहीं मिला होगा और आश्चर्य होता है कि बिना समय दिये कैसे वे अपने व्यवसायिक जीवन में सफल हो गये ।  

इसका  अर्थ  यह  नहीं कि अच्छी किताबें लिखी  नहीं गईं या वे बिकी नहीं अथवा पढ़ी नहीं गई । मनुष्य की सामाजिक, वैचारिक और बौध्दिक विकास एवं उन्नति में इन्ही किताबों का योगदान है लेकिन ऐसी किताबों की हिस्सेदारी उतनी ही है जितनी भारत की आबादी में अमीरों की संख्या ।   

अति उत्साही लेखकों और पाठकों के लिए सूचना - हर वर्ग में कुछ अपवाद भी होते हैं । कुछ पाठक ऐसे भी हैं जो भूखे रहकर भी किताब खरीदकर पढ़ते है किंतु उनकी संख्या नगण्य है वे वर्तमान में अपवाद ही हैं । हर क्षेत्र में ऐसे अपवाद होते हैं , मैने कई विशुध्द शाकाहारी नियमित सुरा प्रेमी भी देखे हैं ।  

इनकारी बयान (disclaimer) - इस लेख से किसी जीवित अथवा मृत लेखक/पाठक का संबंध आकस्मिक संयोग मात्र है । ये लेख पूरी तरह काल्पनिक और लेखक के दिमाग के अंदर कुलबुलाते कीड़े की खुजलाहट मात्र है । जुकर चाचा का इससे कोई लेना देना नहीं है ।

सोमवार, 23 अप्रैल 2012

अन्ना गैंग का MMS


अन्ना गैंग के कोर कमेटी के एक मात्र मुस्लिम सदस्य मौलाना काजमी को टीम से बर्खास्त कर दिया गया ! काजमी दावा कर रहें है कि उन्होने खुद ही अन्ना गैंग को लात मार दी । काजमी की बातों में कितनी सच्चाई है ये तो आने वाला वक्त ही बतायेगा । लेकिन राजू पारेलकर से लेकर वी. पी. राजगोपाल और पर्यावरण कार्यकर्ता राजेंद सिंह तक एक एक कर टीम छोड़ने वाले लोगों की संख्या बढ़ती जा रही है ।


यहाँ ये कहना आवश्यक है कि टीम अन्ना के गद्दीदार केजरी और किरण ने काजमी और राजू की तो खूब  भर्त्सना की और अन्ना से भी करवाई लेकिन राजगोपाल और राजेंद्रसिंह के मामले में मौन रहे । इसका अर्थयही है कि पहले दोनो व्यक्तियों कि सामाजिक क्षेत्र में व्यक्तिगत उपलब्धि और मान्यता प्राप्त नहीं है लेकिन बाकी दो सामाजिक क्षेत्र के कार्यों में प्रतिष्ठित व्यक्ति है इसलिए शायद उनकी मजम्मत करने की हिम्मत नहीं हुई ।

मेरे कुछ अंधे अन्ना भक्तों के लिए मैं कुछ देर के लिए मान भी जाता हूँ कि अन्ना के तीन कार्टून, the 3K -केजरी, कुमार और किरण इमानदारी और सत्यनिष्ठा के मानक प्रतिमान है और मौलाना काजमी झूठ बोल रहें हैं तो इन 3K के ही बयान अनुसार काजमी को इसलिए निकाला गया क्योंकि वे गैंग अन्ना की जासूसी कर रहे थे और बैठकों की गोपनीय तरीके से  विडियो क्लिपिंग बना रहे थे । चलिए ठीक है काजमी की तरफ से मैं स्वीकार करता हूँ कि विडियो क्लिपिंग बनाया लेकिन उस क्लिपिंग में ऐसा क्या था कि इतना बवाल मच गया और काजमी को लात मारकर बाहरकरना पड़ा । क्या उसमें ऐसी कोई बात थी जो सार्वजनिक हो जाती तो अन्ना गैंग की धोती खुल जाती ।

दूसरों को बार बार नसीहत देने वाली अन्ना गैंग को क्या वो दिन याद नहीं जब पिछली गर्मी में जनलोकपाल पर बनी दस सदस्यीय ड्राफ्टिंग कमेटी के विडियो रिकार्डिंग और सीधे प्रसारण की माँग कर सब कुछ पारदर्शी करने का विधवा प्रलाप कर रहे थे । अब अपनी ही मिटिंग की रिकार्डिंग या सीधे प्रसारण को सार्वजनिक करने की बात तो छोड़िये उसकी केवल तीन क्लिपिंग से ही हड़कम्प मचा हुआ है ! 

इंडिया अगेस्ट करप्शन के स्वघोषित सिविल नुमाईंदो आखिर तुम लोग देश की जनता से चंदा इकठ्ठा कर ऐसा कौन सा डेविल काम कर रहे हो जिसके सार्वजनिक होने में तुम्हे अपना चरित्र नंगा होने का भय सता रहा है । कहीं ऐसा तो नहीं कि वास्तव में मौलाना काजमी ही सही हों और वे तुम्हारे असलियत और इस आंदोलन के की  आड़ में छुपे हुए कुटिल इरादों को रिकार्ड कर लिया हो ।

काजमी की बात कहाँ तक सही है ये तो आने वाले वक्त में यकीनन पता चल जायेगा क्योंकि भूषण का चरित्र उसे लम्बे समय तक खामोश बैठने नहीं देगा और केजरी बाबू, ये कुमार विश्वास तब तक ही  तुम्हारा साथ निभायेगा जब तक इस आंदोलन के कारण उसकी भाँड सम्मेलन में माँग बनी रहेगी ।  इसलिए ये शतुरमुर्ग की तरह  अपना गर्दन रेत में गाड़ कर ये मत सोचो कि कोई तुम्हारी असलियत नहीं देख पायेगा । जिस दिन जनता ये बात समझ गई उस दिन तुम्हारी हालत धोबी के चौपाये जैसी हो जायेगी । ना तो सिविल सोसाईटी के मेम्बर रह पाओगे ना ही डेविल सोसाईटी के , तब तुम्हारा ये संगठन IAC सामान्य ज्ञान की किताब में इण्डिया एलान्ग विथ करप्टेड मीर जाफर्स लिखा जायेगा ॥ 

बुधवार, 28 मार्च 2012

सरदार और असरदार अर्थशास्त्र

कल जरा फुर्सत मिली तो लोकसभा में बजट पर चर्चा सुनने लगा ! शाम 3.30 को छ बार बजट पेश कर चुके पूर्व वित्त मंत्री और हजारीबाज ( झारखण्ड ) से वर्तमान सांसद यशवंत सिन्हा जी का अभिभाषण और उसके बाद वित्तमंत्री प्रणव मुखर्जी का बयान सुना ! सबसे पहले तो इस बात की खुशी मिली कि संसद में इन डेढ़ घण्टों में बिना कोई शोर शराबे के गंभीर और सार्थक परिचर्चा सुनने को मिली ! प्रणव दा निसंदेह  UPA  सरकार में सबसे योग्य और निर्विवाद मंत्री है जिनका विरोधी भी सम्मान करतें है !
उन्होने बड़ी गम्भीरता से इस बात पर जोर दिया कि देश की अर्थव्यवस्था पर पेट्रोलियम पदार्थों का काफी असर पड़ता है और पेट्रोलियम पदार्थ का अधिकांश मात्रा आयात की जाती है ! अन्य चीजें जो भारत में उत्पादित नहीं होती है उन्हे आयातित किया जाता है और जो चीजें निर्यात की जातीं है उसका मूल्य भी विदेशी बाजार ही तय करतें है अत: ये बिल्कुल ठीक है कि मँहगाई के निर्धारण में विदेशी बाजार के प्रभाव को नकारा नहीं जा सकता ! सरकार को अपने खर्चे और अन्य विकास कार्यों के लिए भी राशि आवश्यक होती है जिसे उसे टैक्स के जरिये हासिल करने के अलावा कोई बड़ा विकल्प नहीं है !
लेकिन कोई भी इस बात से असहमत नही होगा पर यदि इन विकास कार्यों पर खर्च की जाने वाली राशि भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ जाय तो देश के टैक्स पेयर जनता का ये शोषण नहीं तो और क्या है और इस शोषण की जिम्मेदारी कौन लेगा ! NRHM , NRGA जैसी योजनाओं में होने वाले करोड़ों के भ्रष्टाचार पर अंकुश लगाने की जिम्मेदारी किसकी है ! क्या टैक्स बढ़ाने की बजाय इन भ्रष्टाचारों पर अंकुश लगाकर देश का फिजूल व्यय कम नहीं किया जा सकता !
अर्थशास्त्र का नियम यदि ये कहता है कि व्यय की पूर्ति हेतु आय बढ़ाया जाना आवश्यक है तो क्या ये नियम अर्थशास्त्र से बाहर है कि आय ना बढ़ाकर फिजूल खर्ची और भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ने वाली राशि को रोककर व्यय कम किया जाय !


सीधा सा अर्थशास्त्र है! ये मुझ जैसे सामान्य अर्थशास्त्र की जानकारी रखने वाले बस्तरिया को समझ में तो आती है लेकिन हार्वर्ड शिक्षित सरदारों के पल्ले नहीं पड़ती ! क्या हार्वर्ड मे अर्थशास्त्र का ये दूसरा नियम नहीं पढ़ाया जाता ! सरकार का काम केवल योजना बना कर पैसे खर्च करना ही नहीं वरन उस पैसे से कितनी उत्पादकता हुई और कितना पैसे का उपयोग् हुआ ये भी सुनिश्चित करना है !

देश में मंहगाई कम करने का ये तरीका भी है जो इस अनपढ़ जंगली बस्तरिया नक्सली का सिध्दांत है ! हार्वड के अर्थशास्त्री तो अपने ज्ञान में फेल हो चुके हैं तो इस अर्थशास्त्री के सिद्धांत पर अमल करने में क्या जाता है ! पता नहीं मेरी शिक्षा और सिध्दांत गलत है या सही पर मेरा बजट तो इसी दूसरे सिध्दांत पर टिका हुआ है और आज 19 वर्षों से कभी घाटे का बजट पेश नहीं हुआ है !! जय हो !!

बुधवार, 21 मार्च 2012

बुध्दजीवियों की संगोष्ठी और कार्यशाला


सोशियल नेटवर्किंग साईटस पर अक्सर देखता हूँ बड़े नामचीन लोग अपना फेस दिखाता हुआ तस्वीर डालते हैं और बताते हैं कि एक बहुत ही गंभीर मसले पर एक कार्यशाला थी ! कई देशों के सुविख्यात लोग इसमें शरीक हुए और बहुत ही व्यापक और शोध परक तथ्यों का पाठन हुआ ! कुल मिलाकर संगोष्ठी अत्यंत सफल रही !

मुझे आज तक इन संगोष्ठियों का अर्थ और सफलता का मापदण्ड समझ नहीं आया क्योंकि समस्यायें तो जस कि तस बनी हुई हैं ! क्या संगोष्ठी के सफल होने का अर्थ ये है कि खाने पीने और ठहरने की उच्च स्तरीय व्यवस्था थी और बड़े पुरूस्कारों ,सम्मानों ने नवाजा गया !
आखिर इन संगोष्ठियों का वास्तविक धरातल पर क्या अर्थ है ! ये बात मैं अपने निजी अनुभव के आधार पर कह रहा हूँ ! बस्तर में नक्सलवाद पर कई उच्च स्तरीय संगोष्ठी पर लाखों रूपये खर्च कर आयोजन किया जाता रहा है और जाने माने विशेषज्ञ इन संगोष्ठीयों, कार्यशालाओं में अपने उच्चस्तरीय व्याख्यान देते रहें है लेकिन वास्तविक धरातल पर समस्या सुलझने के बजाय और विकराल रूप लेती जा रही है ! आखिर इन बुध्दजीवी कार्यशालाओं से समस्या उन्मूलन का क्या सम्बंध है और ये आयोजित ही क्यों होते हैं !

अभी कुछ दिनों पूर्व ही भारीभरकम स्थापना व्यय वाले योजना आयोग की रिपोर्ट आई थी जिसमें गरीब होने के मापदण्ड को कई विद्वानों और अर्थशास्त्रीयों ने अथक परिश्रम और करोड़ों रू खर्च कर पहले 32 रू निर्धारित किया था फिर कम पढ़े लिखे और जाहिलों के दबाव में पुन: वातानूकूलित कक्ष में बैठकर उन चिल्लाने वालों मे से कुछ को अमीर बनाने हेतु 28 रू किया ! धन्य है ऐसे बुध्दजीवी
, विचारक, और धन्य है इनकी संगोष्ठी और कार्यशाला !! इनकी ही सदैव जय हो !!  

शुक्रवार, 16 मार्च 2012

जन्मदिन मुबारक हो दादू


बीस हजार की आबादी वाला नगरीय संस्कृति को आत्मसात करता एक अर्धविकसित एक कस्बा ..  पद्मनाभपुर ! महाराज भीखम सिंह कस्बे के मालगुजार हैं ! विरासत में पुरखों ने इतनी सम्पत्ति छोड़ रखी है कि सात पुश्तों तक कुछ काम करने की आवश्यकता ही नहीं ! अतीत की वैभव से आज भी दमकती शानदार हवेली ! हवेली के  सामने दस एकड़ में फैली फूलों की बगिया, सैकड़ों वफादार नौकरचाकर, दिन रात सेवा में इस कदर तत्पर है कि उनका वश चलता तो ईश्वर से महाराज की सारी तकलीफें अपने लिए माँग लेते, और हों भी क्यों न ?  इतना सबकुछ होने के बावजूद महाराज में तिल मात्र का भी अहंकार नहीं ! नौकर-चाकरों को परिवार के सदस्यों सा स्नेह, प्यार, दुलार दिया करते हैं ! उनके हर सुख-दुख में, रीति रिवाजों में छूआछूत, भेदभाव भूलकर स्वयं सम्मिलित होते हैं ! 

अभी पिछले दिनों ही महाराज ने कस्बे की तीन दलित निर्धन कन्याओं के विवाह का सारा खर्च उठाया था ! विवाह भी ऐसी शानदार और शाही कि आसपास के सारे छत्तीस गाँवो के लोगों ने देखा और मुक्त कण्ठ से प्रशंसा की ! महाराज ने खुद बारातियों का स्वागत किया और पूरे समय ऐसे व्यस्त रहे जैसे उनके स्वयं की बिटिया की शादी हो ! सारा कस्बा उन्हे भगवान की तरह पूजता था ! वे लोगों के लिए थे भी दयानिधि ! सारा जीवन लोगों के दुखदर्द बाँटने और पीड़ा हरने में निस्वार्थ भाव से समर्पित था !

महाराज भीखम सिंह शरीर से भले ही पतले दुबले कृशकाय हों लेकिन चेहरे में ऐसी दबंगता और गंभीरता की लोग सम्मान के साथ साथ भय भी खाते थे ! किसी की हिम्मत नहीं थी कि उनके सामने नजरें उठाकर जबान चलायें ! अजीब शख्सियत थी उनकी इतने उदार होने के बावजूद भी कभी किसी से विनोद या हास परिहास नहीं करते थे ! शायद यही कारण है कि लोग उनसे खौफ भी खाते थे !

लेकिन इससे उलट गाँव के बच्चों का सबसे प्रिय पात्र अगर कोई था तो वो महाराज ही थे ! बच्चे उनकी धोती भी खींचकर भाग जाते थे लेकिन वो गुस्सा होने के प्रयास में असफल हो जाते और चेहरे पर दुर्लभ सी हँसी आने से नहीं रोक पाते ! बच्चों के सामने वे खुद को असहाय पाते थे ! सारी रौबदारी यूँ गायब हो जाती जैसे उषा की किरणों को पाकर फूल पर से ओस की बूँदे ! 

इतना वैभव होने के बावजूद भी महाराज की आँखों में हरदम एक अजीब उदासी छाई रहती है लेकिन कभी वे उसे जाहिर नहीं करते ! इसका कारण भी सभी को पता था ! उनकी बगिया में पूरी दुनिया के सारे किस्म के फूल होने के बावजूद उनके अपने जीवन बगिया के आँगन में कोई नन्हा फूल नहीं था ! विवाह के बाईस वर्ष बाद भी उनकी गोद सूनी थी ! इतने सम्मान, उपाधियों के बावजूद उन्हे पिता कह कर पुकारने वाला कोई नहीं था ! यही गम उन्हे अंदर ही अंदर दीमक की तरह खाये जाती थी !

धीरे धीरे उन्होने इसे नियती मानकर कस्बे के बच्चों में अपनी खुशी ढूँढने लगे थे ! शायद यही कारण था कि बच्चों के आगे उनकी सारी गंभीरता, सारी दबंगई गायब हो जातीं और वे खुद बच्चों से हार जाने में अपनी जीत समझते थे ! सारे बच्चे उन्हे बाबा कहकर पुकारते थे और यही वो शब्द था जिसके कारण उनकी साँसे चल रही थी वरना जीने का और कोई मकसद तो बचा नहीं था !  तमाम अच्छाईयों के बावजूद महाराज की सबसे बड़ी कमजोरी थी उनके बागीचे के फूल ! मजाल है कोई सपने में भी उनके बागीचे के फूलों को हाथ लगाकर देखे !

महाराज का सबसे विश्वस्त और वफादार नौकर है रामू काका, जिसने महाराज को बचपने में गोद में खिलाया है ! महाराज उसे बहुत सम्मान करते थे और रामू काका इस बुढ़ापे में भी अपना भरा पूरा परिवार छोड़कर महाराज की हवेली में ही रहता और महाराज की देखभाल करता ! रामू काका का एक नाती भी है हरिया ! हरिया रोज सुबह अपने घर से हवेली आ जाता और फिर यहीं खेलता फिर स्कूल जा कर पुन: स्कूल से हवेली आकर देर शाम तक रहता ! रात उसके पिता आकर उसे जबरदस्ती ले जाते ! जाता भी क्यूँ पूरी हवेली में वो ही अकेला शख्स था जिसे महाराज के किसी भी निजी सामान को भी छूने, तोड़ने, फेंकने की इजाजत थी ! पूरे समय धमाचौकड़ी मचाता ! मजाल है कोई महाराज के सामने उसे टोक दे !

पूरी दुनिया में हरिया ही वो एकमात्र शख्स है जो महाराज को दादू कहता था और महाराज उसे हरी कह पुकारते थे ! उसी ने महाराज के धोती खींचने की परम्परा भी प्रारंभ की थी ! उसका दैनिक नित्यकर्म था महाराज की धोती खींचना या पीछे से कान मरोड़ना ! महाराज उसे पकड़ने दौड़ायेंगे, वो भागकर बागीचे में जाकर घुस जायेगा और फिर फूल तोड़ने की धमकी देगा ! महाराज उससे फूल ना तोड़ने और बाहर निकलने की मनुहार करेंगे फिर इसके लिए सौदेबाजी होगी ! हरिया को कुछ पैसे मिलते फिर वो स्कूल जाता ! हरिया महाराज की इस फूल ना तोड़ने वाली कमजोरी से भली भाँति परिचित था इसलिए उसे जब-जब जेबखर्च चाहिए होता वो इसी तरह बागीचे में फूल तोड़ने की धमकी देकर महाराज को ब्लैकमेल करता था !

रविवार का दिन है ! आज एक अनहोनी हो गई ! पूरी हवेली में अजीब सी बैचैनी और खामोशी छाई हुई है ! यूँ लग रहा था जैसे कोई सूनामी आकर चली गई हो ! शाम को महाराज को अपने बगीचे में टहलते समय पौधों की डालियों से कुछ फूल गायब दिखे ! टहनियाँ साफ साफ चुगली कर रही थीं कि किसी ने वहाँ से फूलों को चुराया है ! खबर कस्बे में जंगल की आग की  तरह फैल गई !

आज हरिया भी धोती खींचकर अपनी वसूली करने नहीं आया था ! किसी ने आकर बताया हरिया ने ही बागीचे से फूल तोड़ा है ! महाराज क्रोध से ऐसे आग बबूले हो उठे थे जैसे जमीन फट कर आसमान को निगलने वाली हो ! “हरिया जहाँ भी हो फौरन पकड़ कर मेरे सामने लाओ” महाराज ने चीखते हुए आदेश दिया !

पहली बार महाराज ने हरिया को हरी ना कह हरिया कहा था ! रामू काका ने हरिया को महाराज के सामने पेश किया ! हरिया के दोनो हाथ पीछे की ओर छुपे हुए थे ! उसे अचानक सामने देख महाराज अपना आपा खो बैठे और बिना कुछ बोले उसके गालों पर तड़ातड़ कई थप्पड़ जड़ दिये ! हरिया के गालों में महाराज के उँगलियों के निशान यूँ उभर आये जैसे किसी जलजले के बाद मलबा दिखाई देता हो ! हाथों ने थक कर जब और प्रहार करने से इंकार कर दिया तो बदहवास से चीख कर बोले “बता तेरी इतनी हिम्मत कैसे हुई मेरे फूलों को छूने की”

सारा कस्बा हवेली में जमा था लेकिन सन्नाटा यूँ पसरा हुआ था जैसे कोई वीरान बियाबान हो ! हरिया ने सिसकते हुए अपने दोनो हाथ आगे कर उन्ही फूलों का गुलदस्ता महाराज की ओर बढ़ाया जिसे उसने तोड़ने का दुस्साहस किया था और काँपते होंठों से कहा ......   “ जन्मदिन मुबारक हो दादू ”  

इतना सुनते ही महाराज को लगा जैसे उन पर कोई बज्रपात हुआ हो ! जोर से चीख कर बस इतना ही कहा मुझे अकेला छोड़ दो ! अगले ही पल हरिया समेत पूरा कस्बा वहाँ से जा चुका था !

रात घिर आयी थी ! हवेली की बाहरी बत्तियाँ भी आज नहीं जली थी ! रामू काका भोजन के आमंत्रण हेतु महाराज के कमरे में दाखिल हुआ ! दरवाजा पहले से ही खुला हुआ पर महाराज अपने कक्ष में नहीं थे ! उन्हे ढूँढते हुए बागीचे की ओर निकल पड़ा ! पूर्णिमा की चाँदनी बागीचे में फैली तो हुई थी पर दूर से कुछ साफ साफ नजर नहीं आ रहा था !
रामू काका जब बागीचे के निकट पहुँचा तो अचानक उसके मुँह से चीख निकल आयी ! उसकी चीख सुनकर पूरी हवेली इकठ्ठी हो गई !

बाहर आँगन की बत्तियाँ जलाई गईं तो देखा सारा बागीचा तहस नहस पड़ा हुआ है ! सारे पौधे किसी ने उखाड़ फेंके थे ! बागीचे के बीचोंबीच बने फव्वारे पर महाराज अर्ध चेतन से गिरे हुये है ! पास जाकर देखा तो उनके हाथों में हरिया का वही गुलदस्ता, आँखों में अश्रु की अविरल धारा बह रही हैं और सांसे उखड़ती चली जा रही थी ! रामू काका ने उनका सिर अपनी गोद में उठाया और धीरे से पुकारा “महाराज” ! किसी तरह महाराज ने आँखे खोलीं और कहा “ हरी कहाँ है ” ! हरिया उनके पास ही खड़ा था, सामने आया तो महाराज ने उसे जोर से भींच कर छाती से लगाया और कहा “हो सके तो अपने इस बेरहम दादू को मॉफ कर देना मेरे लाल ” !  हरिया कहता भी क्या, इतनी छोटी सी उम्र में भी उसे अपने गालों पर पड़े निशानो की कीमत का पता चल गया था ! उसके आँख से सुबह की मार के आँसू अब बह रहे थे पर जो कीमत उसे इस मार के बदले मिली थी उसके लिए वो रोज ऐसी मार खाने के लिए मन ही मन ईश्वर से याचना कर रहा था !

अजीब नजारा था दोनों की आँखो से अविरल अश्रु बह रहे थे और दोनो ही एक दूसरे को ना रोने की समझाईश दे रहे थे ! और दोनो की ये स्थिति देखकर पूरी हवेली के लोग रो रहे थे ! पर सभी के आँखों में वही आँसू थे जो कमोबेश अत्यधिक खुशी के क्षणोँ में अनायास ही सबके ये वहीं आँखों से निकल आते हैं !

सभी ने समवेत स्वर में कहा " जन्मदिन की बधाई हो महाराज "